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ग़ज़ल
समझ में न आए तो मेरी ख़मोशी को दिल पर न लेना
कि ये अक़्ल वालों की दानिस्त से मावरा तजरबा है
जव्वाद शैख़
ग़ज़ल
वो सदमा जिस के सबब मैं हूँ सर-ब-ज़ानू अभी
अजब नहीं मिरी दानिस्त में हुआ ही न हो
ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
ग़ज़ल
मिरी दानिस्त-ए-नाक़िस में कमाल-ए-ख़ुद-नुमाई है
ज़मीं से आसमाँ तक आप का मशहूर हो जाना
मैकश नागपुरी
ग़ज़ल
बज़्म-ए-आलम हो कि महशर मेरी दानिस्त में है
इक तजल्ली का कई रुख़ से नुमायाँ होना
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
मुनव्वर जिस के दिल में आरिज़-ए-जानाँ नहीं होता
मिरी दानिस्त में वो हाफ़िज़-ए-क़ुरआँ नहीं होता