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ग़ज़ल
कहाँ से तू ने ऐ 'इक़बाल' सीखी है ये दरवेशी
कि चर्चा पादशाहों में है तेरी बे-नियाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ख़ुदावंदा ये तेरे सादा-दिल बंदे किधर जाएँ
कि दरवेशी भी अय्यारी है सुल्तानी भी अय्यारी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
यक़ीं पैदा कर ऐ नादाँ यक़ीं से हाथ आती है
वो दरवेशी कि जिस के सामने झुकती है फ़ग़्फ़ूरी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये माना दोनों ही धोके हैं रिंदी हो कि दरवेशी
मगर ये देखना है कौन सा रंगीन धोका है
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
इशक़-ओ-मय-ख़्वारी निभे है कोई दरवेशी के बीच
इस तरह के ख़र्ज-ए-ला-हासिल को दौलत चाहिए