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ग़ज़ल
उस से दरयाफ़्त न करना कभी दिन के हालात
सुब्ह का भूला जो लौट आया हो घर शाम के बाद
कृष्ण बिहारी नूर
ग़ज़ल
रख हाथ दिल पर 'मीर' के दरयाफ़्त कर क्या हाल है
रहता है अक्सर ये जवाँ कुछ इन दिनों बेताब सा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
रो रहे हैं दोस्त मेरी लाश पर बे-इख़्तियार
ये नहीं दरयाफ़्त करते किस ने इस की जान ली
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
बज़्म-ए-अग़्यार में उस ने मुझे दरयाफ़्त किया
बा'द मुद्दत के उसे याद मिरी आई है