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ग़ज़ल
अगर कुछ आश्ना होता मज़ाक़-ए-जब्हा-साई से
तो संग-ए-आस्तान-ए-का'बा जा मिलता जबीनों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जो आप दर से उठा न देते कहीं न करता मैं जब्हा-साई
अगरचे ये सरनविश्त में था तुम्हारे सर की क़सम न होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
न आया रहम कुछ भी आह दिल में उस सितमगर के
हमारी जब्हा-साई के असर से आस्ताँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
बे-मय-ओ-मय-ख़ाना-ओ-साक़ी जो आई मुझ को मौत
हल्क़ा-ए-मातम है दौर-ए-चर्ख़-ए-मीनाई नहीं
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
मयस्सर जिस से आ जाती थी साक़ी की क़दम-बोसी
मुक़द्दर में नहीं वो लग़्ज़िश-ए-मस्ताना बरसों से
अब्दुल मजीद सालिक
ग़ज़ल
इस क़दर मिस्ल-ए-क़लम मैं ने जबीं-साई की
बन गया घिस के दर-ए-यार का पत्थर काग़ज़