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ग़ज़ल
जलील क़िदवई
ग़ज़ल
सड़कें चौड़ी रस्ते लम्बे होते जाते हैं
दूर मुसाफ़िर अपने घर से होते जाते हैं
सुश्रुत पंत ज़र्रा
ग़ज़ल
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
दामन की हवा याद न ज़ुल्फ़ों की घटा याद
अब कुछ भी नहीं सोज़-ए-ग़म-ए-दिल के सिवा याद
हयात अमरोहवी
ग़ज़ल
शौक़ की निगाहों का आज इम्तिहाँ कर लें
बे-नियाज़ नज़रों को दिल का राज़दाँ कर लें
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
है बर्क़-ए-ख़िर्मन-ए-जाँ सोज़-ए-निहाँ हमारा
सरगर्म-ए-जल्वा-ए-ग़म हुस्न-ए-बयाँ हमारा
मुंशी मोहम्मद हयात ख़ाँ मज़हर
ग़ज़ल
रुत मिरी बस्ती को इस दर्जा भी बारानी न दे
शहर-ए-दिल के सब्ज़ा-ज़ारों को ये वीरानी न दे