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ग़ज़ल
शुक्र किया है इन पेड़ों ने सब्र की आदत डाली है
इस मंज़र को ग़ौर से देखो बारिश होने वाली है
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
तुम्ही को देख कर वो मुस्कुराता है तो हैरत क्या
उसे हँसने की आदत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना
आदिल राही
ग़ज़ल
हम सा हो तो सामने आए आदिल और इंसाफ़-पसंद
दुश्मन को भी ख़ून रुलाया यारों से भी यारी की
आमिर अमीर
ग़ज़ल
सो लेने दो अपना अपना काम करो चुप हो जाओ
दरवाज़ो कुछ वक़्त गुज़ारो दीवारो चुप हो जाओ
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
ख़्वाहिशों का ख़म्याज़ा ख़्वाब क्यूँ भरें 'आदिल'
आज मेरी आँखों से रत-जगा अलग रखना