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ग़ज़ल
है उतना वाक़ि'आ उस से न मिलने की क़सम खा ली
तअस्सुफ़ इस क़दर गोया वज़ारत छोड़ दी हम ने
शहज़ाद अहमद
ग़ज़ल
बजट जब सारे लग जाएँ वज़ारत की ही कुर्सी पर
तो इस तर्ज़-ए-मईशत को गिरानी कौन कहता है
सबीला इनाम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हम ने देखा है इन्हीं आँखों से कुछ बंदों का
चढ़ के कुर्सी-ए-वज़ारत पे ख़ुदा हो जाना
हाशिम अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
साहबो शम्अ ज़मीरों की बुझा कर आओ
यूँ वज़ारत के क़लमदान कहाँ मिलते हैं