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ग़ज़ल
'क़ुतबा' तूँ दास शह का जम फ़ैज़ उस थे माँगें
सौदा है तुज परम सब वक़्त-ए-तिजारत आया
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
میں مست ہوکر سیج میں بے تاب ہورہی تھی نپٹ
باتاں پرم کی کاڑ کر منجھ کیوں جگاتا ساد سے
नुसरती बीजापुरी
ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही
न तो तू रहा न तो मैं रहा जो रही सो बे-ख़बरी रही
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
दिल ने वफ़ा के नाम पर कार-ए-वफ़ा नहीं किया
ख़ुद को हलाक कर लिया ख़ुद को फ़िदा नहीं किया