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ग़ज़ल
अम्बी भुट्टे गन्ना ककड़ी खेत पेड़ पगडंडी छाँव
बेर आम अमरूद-ओ-इमली याद आया है सब का सब
इसहाक़ असर
ग़ज़ल
दो फ़सलें दो नद्दी किनारे आपस में क्या उन का रिश्ता
घर में गिरी जब इमली पक कर बाग़ से तब अमरूद गया
नासिर शहज़ाद
ग़ज़ल
है जिंस परी सा कुछ आदम तो नहीं असलन
इक आग लगा दी है उस अमर्द-ए-ख़ुश-गप ने