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ग़ज़ल
बात अगर न करनी थी क्यूँ चमन में आए थे
रंग क्यूँ बिखेरा था फूल क्यूँ खिलाए थे
कालीदास गुप्ता रज़ा
ग़ज़ल
ज़बाँ पे आह न सीने पे दाग़ लाया मैं
तुम्हारी बज़्म से क्या ना-मुराद आया मैं
कालीदास गुप्ता रज़ा
ग़ज़ल
वो फैले सहराओं की जहाँ-बानियाँ कहाँ हैं
ये सब तो घर जैसा है वो वीरानियाँ कहाँ हैं
कालीदास गुप्ता रज़ा
ग़ज़ल
काहीदा ऐसा हूँ मैं भी ढूँडा करे न पाएगी
मेरी ख़ातिर मौत भी मेरी बरसों सर टकराएगी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
है ये ग़म जाँ-काह ख़ाल-ए-अबरू-ए-ख़मदार का
का'बे में काहीदा हो कर संग-ए-असवद दिल हुआ