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ग़ज़ल
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
ऐ ख़िज़ाँ वालो! ख़िज़ाँ वालो! कोई सोचो इलाज
ये बहारें पाँव में ज़ंजीर सी पहना गईं
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
'ज़हीर'-ए-ख़स्ता-जाँ शब सो रहा कुछ खा के सुनते हैं
तअ'ज्जुब क्या है इंसाँ को हमिय्यत आ ही जाती है
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
बर्क़-ए-ज़माना दूर थी लेकिन मिशअल-ए-ख़ाना दूर न थी
हम तो 'ज़हीर' अपने ही घर की आग में जल कर ख़ाक हुए
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
'ज़हीर' इक रिश्ता-ए-वहशत लिए फिरता है मजनूँ को
वगर्ना कोई अपने आप सहरा में नहीं रहता
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
'ज़हीर' ओ 'अरशद' ओ 'ग़ालिब' का हूँ जिगर-गोशा
जनाब-ए-'दाग़' का तिल्मीज़ ओ यादगार हूँ मैं
साइल देहलवी
ग़ज़ल
ये सब कहने की बातें हैं हम उन को छोड़ बैठे हैं
जब आँखें चार होती हैं मुरव्वत आ ही जाती है
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
हम उन की बज़्म-ए-नाज़ में यूँ चुप हुए 'ज़हीर'
जिस तरह घुट के साज़ में आहंग रह गया