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ग़ज़ल
वे ग़ैर ही हैं जिन की हर इक बात हो सुनते
हम ने तो जो कुछ अर्ज़ की सो सुनते ही टाली
आफ़ताब शाह आलम सानी
ग़ज़ल
क़ुर्ब माँगा तो दिया हिज्र जो माँगा तो दिया
जो कहा मैं ने कोई बात न टाली उस ने
सय्यद मुजीबुल हसन
ग़ज़ल
उस तरफ़ वो तो इधर हम हैं परेशाँ 'बेबाक'
ख़्वाहिश-ए-दीद किसी तौर न टाली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
हवादिस से नबर्द-आराईयों का किस को यारा था
जुनूँ अपना सलामत जिस ने हर उफ़्ताद टाली है