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ग़ज़ल
ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
बशीर बद्र
ग़ज़ल
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं
यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
भरी दोपहर में जो पास थी वो तिरे ख़याल की छाँव थी
कभी शाख़-ए-गुल से मिसाल दी कभी उस को सर्व-ए-सही कहा
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
वो सुब्ह को आए तो करूँ बातों में दोपहर
और चाहूँ कि दिन थोड़ा सा ढल जाए तो अच्छा