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ग़ज़ल
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
पहले भी ख़िज़ाँ में बाग़ उजड़े पर यूँ नहीं जैसे अब के बरस
सारे बूटे पत्ता पत्ता रविश रविश बर्बाद हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
क्या पत्ता कब कौन उस की ज़द पे आ जाए कहाँ
वक़्त की रफ़्तार से हर शख़्स है सहमा हुआ
जहाँगीर नायाब
ग़ज़ल
भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
हर पत्ता ना-आसूदा है माहौल-ए-चमन आलूदा है
रह जाएँ लरज़ती शाख़ों पर दो चार गुलाब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
पत्ता तो आख़िर पत्ता था गुंजान घने दरख़्तों ने
ज़मीं को तन्हा छोड़ दिया है इतनी तेज़ हवाओं में
बशीर बद्र
ग़ज़ल
सुलगते दिल के आँगन में हुई ख़्वाबों की फिर बारिश
कहीं कोंपल महक उट्ठी कहीं पत्ता निकल आया
बशर नवाज़
ग़ज़ल
कोई सुनता तो इक कोहराम बरपा था हवाओं में
शजर से एक पत्ता जब गिरा आहिस्ता आहिस्ता