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ग़ज़ल
अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को
इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था
हबीब जालिब
ग़ज़ल
नसीर-ए-दौलत-ओ-दीं और मुईन-ए-मिल्लत-ओ-मुल्क
बना है चर्ख़-ए-बरीं जिस के आस्ताँ के लिए
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ग़ज़ल की चाहतों अशआ'र की जागीर वाले हैं
तुम्हें किस ने कहा है हम बरी तक़दीर वाले हैं
वरुन आनन्द
ग़ज़ल
जो दूर निगाहों से सर-ए-अर्श-ए-बरीं है
वो नूर सर-ए-गुम्बद-ए-ख़िज़रा नज़र आया
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
ग़ज़ल
बयान-ए-पाएमाली शिकवा-ए-बर्क़-ए-तपाँ हो जा
गुलिस्तान-ए-जहाँ के पत्ते पत्ते की ज़बाँ हो जा
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
सवाब-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं क्या अज़ाब-ए-दोज़ख़ क्या
तिरे ख़िताब की ठंडक तिरे इ'ताब की आँच