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ग़ज़ल
ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का आलम
तिरा हुस्न दस्त-ए-ईसा तिरी याद रू-ए-मर्यम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जो रक्खे चारागर काफ़ूर दूनी आग लग जाए
कहीं ये ज़ख़्म-ए-दिल शर्मिंदा-ए-मरहम भी होते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
महफ़िल में तरी शम्अ बनी मोम की मर्यम
पिघली पड़ी है उस की वो काफ़ूर की गर्दन