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ग़ज़ल
बे-ज़बाँ जो कहते हैं मुझ को सो चुप रह जाएँगे
मारके में हश्र के गर बात की रुख़्सत हुई
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
किसी भी मा'रके पर अब तलक हारी नहीं हूँ मैं
मिरा ज़ेवर रहा है दोस्तों ख़ुद्दारियाँ मेरी
ग़ौसिया ख़ान सबीन
ग़ज़ल
लिबास-ए-मर्द-ए-मैदाँ जौहर-ए-ज़ाती किफ़ायत है
नहीं पिरोए पोशिश मा'रके में तेग़-ए-उर्यां को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जाफ़र शिराज़ी
ग़ज़ल
अभी रेग-ए-दश्त पे सब्त हैं सभी नक़्श मेरे सुजूद के
वो जो मारके का सबब हुआ वही हर्फ़-ए-हक़ मिरी ढाल था
आतिफ़ वहीद यासिर
ग़ज़ल
था दिल तो चीज़ क्या सफ़-ए-मिज़्गाँ के सामने
इस मा'रके में शुक्र ये है बच गया दिमाग़