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ग़ज़ल
मिल कर रोएँ फ़रियाद करें उन बीते दिनों को याद करें
ऐ काश कहीं मिल जाए कोई जो मीत पुराना बचपन का
आनंद बख़्शी
ग़ज़ल
ग़म में डूबा हुआ रहता हूँ मैं अब हर लम्हा
'मीत' ये जाम पिला दूँ तो पिला दूँ किस को
अमित शर्मा मीत
ग़ज़ल
अपने रिश्ते का भी अब 'मीत' बिखरना तय था
हम ने विश्वास के धागे में पिरोया ही नहीं