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ग़ज़ल
तौसन-ए-नाज़ को फेंके है वो जिस दम सरपट
लोग क्या क्या न तग-ओ-ताज़ में मर जाते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ठहर ठहर कर कौंद रही थी बिजली बाहर जंगल में
ट्रेन रुकी तो सरपट हो गया घोड़ा वक़्त की ताज़िश का