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ग़ज़ल
घटते बढ़ते साए से 'आदिल' लुत्फ़ उठाया सारा दिन
आँगन की दीवार पे बैठे हम ने ख़ूब सवारी की
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
जान पड़ जाती है दस्त-ए-नाज़ से हर चीज़ में
रंग बन कर चढ़ती हैं हाथों में सारी चूड़ियाँ