aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".laho"
रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमताजिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहनहमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है
इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैंचीख़ता हूँ बदन की उसरत में
आँखें हैं कि ख़ाली नहीं रहती हैं लहू सेऔर ज़ख़्म-ए-जुदाई है कि भर भी नहीं जाता
दिल में इक लहर सी उठी है अभीकोई ताज़ा हवा चली है अभी
कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहींकि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा
सूझ-बूझ की बात नहीं है मन-मौजी है मस्तानालहर लहर से जा सर पटका सागर गहरा भूल गया
अपनी लहर है अपना रोगदरिया हूँ और प्यासा हूँ
कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगाकिस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी
मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहूहम से कहते हैं वही अहद-ए-वफ़ा याद नहीं
बहुत आरज़ू थी गली की तिरीसो याँ से लहू में नहा कर चले
ज़ख़्म गर दब गया लहू न थमाकाम गर रुक गया रवा न हुआ
दारा ओ सिकंदर से वो मर्द-ए-फ़क़ीर औलाहो जिस की फ़क़ीरी में बू-ए-असदुल-लाही
ज़िंदगी भर लहू रुलाएगीयाद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद
ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गईवो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया
यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंगजैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन
बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहींकिस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा
मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दियाइक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
वो जान-ए-जाँ नहीं आता तो मौत ही आतीदिल-ओ-जिगर को कहाँ तक भला लहू करते
नाज़ुक-मिज़ाज आप क़यामत हैं 'मीर' जीजूँ शीशा मेरे मुँह न लगो मैं नशे में हूँ
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