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ग़ज़ल
घरों की तर्बियत क्या आ गई टी-वी के हाथों में
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
मुझे बताओ कि मेरी नाराज़गी से तुम को है फ़र्क़ कोई
मैं खा रही हूँ न-जाने कब से ही पेच-ताव मुझे मनाओ
आमिर अमीर
ग़ज़ल
कभी तुम साफ़ करते हो मिरे दिल की कुदूरत कूँ
कभी तुम बे-सबब तेवरी चढ़ा कर ताव करते हो
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
बड़ी सर्द रात थी कल मगर बड़ी आँच थी बड़ा ताव था
सभी तापते रहे रात भर तिरा ज़िक्र क्या था अलाव था
शमीम अब्बास
ग़ज़ल
अमरीका में टी-वी-चैनल चुपके से दर आए थे
चल निकले तो उर्दू के सब अख़बारों को मार दिया
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
सर्द हवा या टूटा ताव पूरी रात अधूरा चाँद
मेरे आँगन की मिट्टी को जाने कौन भिगो जाता है
अज़हर नक़वी
ग़ज़ल
बोलने की भी यहाँ क़ीमत चुकाई जा रही है
दिन दहाड़े सच की अब गर्दन दबाई जा रही है