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ग़ज़ल
उन्हें मंज़ूर अपने ज़ख़्मियों का देख आना था
उठे थे सैर-ए-गुल को देखना शोख़ी बहाने की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मेरे उज़्र-ए-जुर्म पर मुतलक़ न कीजे इल्तिफ़ात
बल्कि पहले से भी बढ़ कर कज-अदा हो जाइए
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
मु'आफ़ कर मिरी मस्ती ख़ुदा-ए-अज़्ज़ा-व-जल
कि मेरे हाथ में साग़र है मेरे लब पे ग़ज़ल
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक़ हैफ़ है
दिल तलब करता है ज़ख़्म और माँगे हैं आ'ज़ा नमक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
जहाँ ख़ाली नहीं रहता कभी ईज़ा-दहिंदों से
हुआ नासूर-ए-नौ पैदा अगर ज़ख़्म-ए-कुहन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
सितम की तेग़ ख़ुद दस्त-ए-सितम को काट देती है
सितम-रानो तुम अब अपने अज़ा-ख़ानों में आ जाओ