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ग़ज़ल
तिरी यादों के चराग़ों में ये जलती हुई रात
मिरी आँखों से छलकती रही ढलती हुई रात
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
ये किस करनी का फल होगा कैसी रुत में जागे हम
तेज़ नुकीली तलवारों के बीच में कच्चे धागे हम
अहसन यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
तुम्हारी याद में कुछ यूँ नए मौसम बनाता हूँ
मैं सहरा-ए-जुनूँ में रेत से शबनम बनाता हूँ
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
ग़ज़ल
इक लम्हा जो फ़ुर्क़त के सिवा और भी कुछ था
इक ग़म जो क़यामत के सिवा और भी कुछ था