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ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
मुब्तला-ए-दर्द होने की ये लज़्ज़त देखिए
क़िस्सा-ए-ग़म हो किसी का दिल मिरा धक धक करे
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
लाख बुनियादों में तू ने ढक के रक्खा है मुझे
ऐ हवेली के खंडर अब भी तरह हिस्सा हूँ मैं
शाहिद जमाल
ग़ज़ल
ये मन करता है बादल आ के ढक लें चाँद को पूरा
हों जब वो पास तो फिर चाँदनी अच्छी नहीं लगती