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ग़ज़ल
हम-वतनों के दर्द का दरमाँ ऐसा कुछ दुश्वार नहीं
नाम-ए-वतन है इस्म-ए-आज़म ख़ाक-ए-वतन इक्सीर लिखो
इलियास इश्क़ी
ग़ज़ल
वो ज़ौक़-ए-फ़न हो कि शाख़-ए-चमन कि ख़ाक-ए-वतन
हर इक का हक़ है मिरे ख़ूँ के क़तरे क़तरे पर
वफ़ा मलिकपुरी
ग़ज़ल
वो ज़ौक़-ए-फ़न हो कि शाख़-ए-चमन कि ख़ाक-ए-वतन
हर इक का हक़ है मिरे ख़ूँ के क़तरे क़तरे पर
वफ़ा मलिकपुरी
ग़ज़ल
मुँह पे मल लेते हैं हम ख़ाक-ए-मदीना की तरह
माँ के क़दमों की तरह ख़ाक-ए-वतन चूमते हैं
आलम निज़ामी
ग़ज़ल
हम-वतन ख़ाक-ए-वतन क्यूँ न हो प्यारी कि हमें
बा'द-अज़-मर्ग भी जाना है इसी मिट्टी में