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ग़ज़ल
नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में था
यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
क्यों ज़ुल्मत-ए-ग़म से हो 'ख़ुमार' इतने परेशान
बादल ये हमेशा ही तो काले न रहेंगे