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ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
कू-ए-जानाँ में भी ख़ासा था तरह-दार 'फ़राज़'
लेकिन उस शख़्स की सज-धज थी सर-ए-दार जुदा
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
एक मद्धम आँच सी आवाज़ सरगम से अलग कुछ
रंग इक दबता हुआ सा पूरे मंज़र में अकेला
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की निय्यत ठीक नहीं
निकला न करो तुम सज-धज कर ईमान की निय्यत ठीक नहीं
हसरत जयपुरी
ग़ज़ल
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह
खींच कर देख मिरे सीने से तू तीर न तोड़
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
नश्शा-ए-सद-जाम कैफ़-ए-इंतिज़ार-ए-यार था
हिज्र में ठहरा हुआ दिल साग़र-ए-सरशार था