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ग़ज़ल
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने
जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जाएगा लहू
नाम-ए-ख़ुदा हो जवान अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
साबिर ज़फ़र
ग़ज़ल
ये झोंके जिन से दिल में ताज़गी आँखों में ठंडक है
इन्ही झोंकों से मुरझाया हुआ शब भर रहा हूँ मैं