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ग़ज़ल
हक़ तो है कुछ हाल-ए-दिल अपना कहते हैं जब तुम से हम
कान लगाए सुनते हो पर ध्यान लगा है और कहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
बरून-ए-मय-कदा ही क्यों ये रोक-टोक पूछ-ताछ
तिरी तरफ़ से साक़िया अगरचे इज़्न-ए-आम है