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ग़ज़ल
मिल भी जाता जो कहीं आब-ए-बक़ा क्या करते
ज़िंदगी ख़ुद भी थी जीने की सज़ा क्या करते
तनवीर अहमद अल्वी
ग़ज़ल
लगा मजनूँ को ज़हर-ए-इश्क़ क्या आब-ए-बक़ा हो कर
वो ज़िंदा हो गया गोया मोहब्बत में फ़ना हो कर
सरताज आलम आबिदी
ग़ज़ल
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
ऐ 'बक़ा'-ए-कारवाँ इस रेख़्ते की हर रदीफ़
गरचे है बे-कार पर बतला कहाँ बे-कार है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
हो अगर ये दिल-ए-सोज़ाँ तिरे क़ुलियाँ की चिलम
आब-ए-नय से जो ये नर्सल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
लाला-रूयों की मोहब्बत में अब ऐ सर्व-ए-सही
सर-ब-सर दाग़ तू और सर्व-ए-ख़िरामाँ हम हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
चश्म-ए-साक़ी के लिए हैं तेग़-ए-अबरू दोश पर
लग न चल उन से 'बक़ा' ये तुर्क मस्त-ए-बादा हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
दाम-ए-बला से अब 'बक़ा' हम से असीर कब छुटें
रिश्ता-ए-ग़म से गुथ गए बाल-ब-बाल पर-ब-पर