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ग़ज़ल
कहा ये आबला-ए-पा ने दश्त-ए-ग़ुर्बत में
ज़रा ख़याल रहे नोक-ए-ख़ार हम भी हैं
नवाब उमराव बहादूर दिलेर
ग़ज़ल
'शान' बे-सम्त न कर दे तुम्हें सहरा-ए-हयात
ज़ेहन में उन के नुक़ूश-ए-कफ़-ए-पा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
वो मिटा देंगे हमारी अज़्मतों का हर निशाँ
चाँद-तारों से हमारा नक़्श-ए-पा ले जाएँगे