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ग़ज़ल
किरन फूटी उफ़ुक़ पर आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर की
सुनाए जाओ अपनी दास्तान-ए-ज़िंदगी कब तक
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
मैं कई सदियों से गुम हूँ ख़्वाब के सकरात में
आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-बेदारी मिरे सर पर निकल