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ग़ज़ल
वो बुत-ए-शीरीं-अदा करता है मुझ को संगसार
ये शकर-पारे बरसते हैं जुनूँ पत्थर नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
आँखों को इंतिशार है दिल बे-क़रार है
ऐ आने वाले आक़ा तिरा इंतिज़ार है
इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल
ग़ज़ल
मैं अक्खा इंडिया फिरता हूँ आज भी 'वाहिद'
मैं शेर लिख्खूँ लिखाऊँ किसी के बाप का क्या