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ग़ज़ल
किसी के भूल जाने से मोहब्बत कम नहीं होती
मोहब्बत ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती
ग़म बिजनौरी
ग़ज़ल
अरे 'ग़म' लग़्ज़िश-ए-सोज़-ए-जिगर का कैफ़ क्या कहिए
ज़बाँ मजबूर हो जाती है जब दिल में उतरती है
ग़म बिजनौरी
ग़ज़ल
ऐ बुलबुल-ए-दिल यूँ ग़म पी कर मत चहक कि अब लब को सी ले
सब साज़ बुरीदा-हाल हुए अब राग पुराना मुश्किल है
अनीस अब्र
ग़ज़ल
मुझ से कहती है मिरी रूह निकल कर शब-ए-ग़म
देख मैं हूँ तिरे निकले हुए अरमानों में
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
हैराँ नहीं हैं हम कि परेशाँ नहीं हैं हम
इस पर भी शाकी-ए-ग़म-ए-दौराँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
चलो अच्छा हुआ तुम आ गए दम तोड़ता था मैं
यही दुश्वार थी साअ'त यही था वक़्त मुश्किल का
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
कौन अब कश्मकश-ए-ज़ीस्त से दे मुझ को नजात
कर चुका है मिरा क़ातिल नज़र-अंदाज़ मुझे
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
'अब्र' मैं क्या कह सकूँगा उन से हाल-ए-दर्द-ए-दिल
जो ज़बाँ से लफ़्ज़ निकलेगा फ़ुग़ाँ हो जाएगा