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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर
कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर
कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें