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ग़ज़ल
मुझे आब-ओ-ख़ाक से मावरा किसी अप्सरा की तलाश थी
किसी माह-रू किसी गुल-बदन किसी जल-परी से बनी नहीं
इम्तियाज़ अंजुम
ग़ज़ल
यावर अज़ीम
ग़ज़ल
क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्याद बचा
ताइर उड़ते हवा में सारे अपने असारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
उस रोज़ जो उन को देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है
उस रोज़ जो उन से बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता
आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता