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ग़ज़ल
'अबस है पेश-ए-अर्बाब-ए-सुख़न अज़्म-ए-सुख़न मुझ को
वफ़ा कहने न देगी क़िस्सा-ए-रंज-ओ-मेहन मुझ को
अब्बास अली ख़ान बेखुद
ग़ज़ल
बार हूँ दीदा-ए-अर्बाब-ए-सुख़न पर 'मुज़्तर'
मुद्दई मेरे कमालों से दबे जाते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
बशीर बद्र
ग़ज़ल
बाइ'स-ए-हैरत-ए-अर्बाब-ए-सुख़न है 'महरूम'
अहद-ए-पीरी में तुम्हारा ये ग़ज़ल-ख़्वाँ होना
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
'सौदा' है न 'इंशा' है 'ग़ालिब' है न 'अकबर' है
हों हिन्द में फिर ऐसे अर्बाब-ए-सुख़न पैदा
हकीम अनवार मोहम्मद ख़ाँ कामिल
ग़ज़ल
छेड़ी जो ग़ज़ल मैं ने अर्बाब-ए-सुख़न बोले
क्या हुस्न है शे'रों में क्या जादू-बयानी है
ज़हीरुन्निसा निगार
ग़ज़ल
चाँद पर बैठ के लिखते हैं ग़ज़ल जानाँ पर
जब भी अर्बाब-ए-सुख़न ख़्वाब से जुड़ जाते हैं
कलीम शादाब
ग़ज़ल
भला अब कौन है पुरसान-ए-अर्बाब-ए-सुख़न 'बिस्मिल'
मगर फिर आप की ख़ू-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
बुलंदी नाम से ऐ 'अर्श' मिल सकती नहीं तुझ को
ज़मीन-ए-शेर पर औज-ए-सुख़न से आसमाँ हो जा
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
अपना भी ज़िक्र है अर्बाब-ए-सुख़न में 'वासिफ़'
ये बहुत है कि परस्तार-ए-ग़ज़ल हम भी हैं