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ग़ज़ल
अश्कों से अपने दिल को हिकायत दामन पर इरक़ाम करो
इश्क़ में जब यही काम है यार वले के ख़ुदा का नाम करो
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
आज तो हमदम अज़्म है ये कुछ हम भी रस्मी काम करें
किल्क उठा कर यार को अपने नामा-ए-शौक़ अरक़ाम करें
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
इधर फ़रिश्ता-ए-कर्रोबी और उधर ग़िल्माँ
क़लम को लौह पे बख़्शी है ताक़त-ए-इर्क़ाम
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हम मुसलमानों से याँ तक तो ये हिन्दू बर-अक्स
कि कभी ख़त भी जो करते हैं तो अरक़ाम उल्टा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
या'नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया