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ग़ज़ल
रह के गुलशन में भी तरसे हैं गुल-ए-तर के लिए
ये मुक़द्दर था तो क्या रोएँ मुक़द्दर के लिए
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
तबीअ'त बे-नियाज़-ए-लज़्ज़त-ए-ग़म होती जाती है
किसी से क्या मिरी दिल-बस्तगी कम होती जाती है
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
बुलंदी नाम से ऐ 'अर्श' मिल सकती नहीं तुझ को
ज़मीन-ए-शेर पर औज-ए-सुख़न से आसमाँ हो जा
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
घटा सावन की और ऐ 'अर्श' इलहामात की बारिश
ज़मीं पर आज फ़ैज़-ए-आसमाँ यूँ भी है और यूँ भी
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
तुम लुत्फ़ को जौर बताते हो तुम नाहक़ शोर मचाते हो
तुम झूटी बात बनाते हो ऐ 'अर्श' ये अच्छी बात नहीं