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ग़ज़ल
झलकता है मिज़ाज-ए-शहरयारी हर बुन-ए-मू से
ब-ज़ाहिर 'ख़ैर' हर्फ़-ए-ख़ाकसारी ले के निकला है
रऊफ़ ख़ैर
ग़ज़ल
हश्र मिरा ब-ख़ैर हो मुझ को बना रहे हो तुम
ख़ाक में जान डाल कर ख़ाक उड़ा रहे हो तुम
मीम हसन लतीफ़ी
ग़ज़ल
हमारे ख़्वाब सलामत तसव्वुरात ब-ख़ैर
नज़र से दूर हमारी वो रात भर न हुए
अब्दुसत्तार अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
आ शैख़ मय-कदे में तेरी आक़िबत ब-ख़ैर
रहमत को बोतलों में छुपाए हुए हैं हम