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ग़ज़ल
ज़िंदगी के दश्त में आया न जब अक्स-ए-बहार
मैं ने ख़ुद को ख़ुद दिखाया वहशतों का सिलसिला
बहारुन्निसा बहार
ग़ज़ल
तितलियों को रोक लो जाने न दो बाद-ए-सबा
अब 'बहार'-ए-बे-ख़िज़ाँ का है गुज़ारा रेत पर
बहारुन्निसा बहार
ग़ज़ल
बादा-ओ-जाम की तरफ़ उस की नज़र उठेगी क्या
जिस को सुरूर मुस्तक़िल तेरी निगाह-ए-नाज़ दे
शिवराज बहार
ग़ज़ल
अज़्म-ए-मोहकम हो तो बन जाता है मक़्सद राहबर
ख़ुद सहारा देगी फ़िक्र-ए-दूरी-ए-मंज़िल मुझे