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ग़ज़ल
वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए
वीराना क्यूँ हैं बस्तियाँ बाशिंदे क्या हुए
शीन काफ़ निज़ाम
ग़ज़ल
बाशिंदे हक़ीक़त में हैं हम मुल्क-ए-बक़ा के
कुछ रोज़ से मेहमान हैं इस दार-ए-फ़ना के
मर्दान अली खां राना
ग़ज़ल
गर रोए तो आँखों के सब बाशिंदे बह जाएँगे
हाए शिकस्ता ख़्वाब हमारे इस बस्ती में रहते हैं
प्रबुद्ध सौरभ
ग़ज़ल
घर में बाशिंदे तो इक नाज़ में मर जाते हैं
और जो हम-साए हैं आवाज़ में मर जाते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
तिरी बस्ती के बाशिंदे बहुत आसूदा-ख़ातिर हैं
तकल्लुफ़ हो रहा है दर्द को पोशाक करने में