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ग़ज़ल
न ग़ुरूर है ख़िरद को न जुनूँ में बाँकपन है
ये मिज़ाज-ए-ज़िंदगी तो बड़ा हौसला-शिकन है
फ़रीद जावेद
ग़ज़ल
ये विसाल ओ हिज्र का मसअला तो मिरी समझ में न आ सका
कभी कोई मुझ को न पा सका कभी मैं किसी को न पा सका
हिलाल फ़रीद
ग़ज़ल
तर्क इन दिनों जो यार से गुफ़्त-ओ-शुनीद है
हम को मोहर्रम और रक़ीबों को ईद है
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
था जो शेर-ए-रास्त सर्व-ए-बोसतान-ए-रेख़्ता
अब वही है लाला-ए-ज़र्द-ए-ख़िज़ान-ए-रेख़्ता