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ग़ज़ल
नई उम्रों की ख़ुद-मुख़्तारियों को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
कौन सहराओं की प्यास है इन मकानों की बुनियाद में
बारिशों से अगर बच भी जाएँ तो दरिया नहीं छोड़ता
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
तुम्हारी दुनिया में कितना मुश्किल है बच के चलना
क़दम क़दम पर तो आस्ताने बने हुए हैं
ज़िया मज़कूर
ग़ज़ल
क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है
चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है