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ग़ज़ल
सबा अफ़ग़ानी
ग़ज़ल
मिरी बहार-ओ-ख़िज़ाँ जिस के इख़्तियार में है
मिज़ाज उस दिल-ए-बे-इख़्तियार का न मिला
यगाना चंगेज़ी
ग़ज़ल
पज़मुर्दा एक है तो शगुफ़्ता है दूसरा
बाग़-ए-जहाँ में फ़स्ल-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ नहीं