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ग़ज़ल
मंदिरों में संख बाजे मस्जिदों में हो अज़ाँ
शैख़ का धर्म और दीन-ए-बरहमन आज़ाद है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल
हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हिम हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
शहरों शहरों फिरते हैं दीवानों का बहरूप भरे
ख़ुद से छुप कर ख़ुद को ढूँड रहे हैं बाज़े बाज़े लोग
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
यूँ गजर सुब्ह का जल्दी से बजे वस्ल की रात
अरे बे-रहम अरे दिल के सताने वाले
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
बारा बजे के ब'अद इक दिन को निकालते हुए
देखा तो जा चुका हूँ पर पकड़ा नहीं गया हूँ मैं
फ़ैज़ान हाशमी
ग़ज़ल
तिरे पाक-बाज़-ए-उल्फ़त नहीं हारने के हिम्मत
जो मरेंगे डूब कर भी तो मरेंगे रह के प्यासे
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
बचपन याद के रंग-महल में कैसे कैसे फूल खिले
ढोल बजे और आँसू टपके कहीं मोहर्रम होने लगा
अब्दुल हमीद
ग़ज़ल
सारा घर सोता है दो घंटे में आएगा अख़बार
आज 'मुज़फ़्फ़र' पाँच बजे ही कैसे बिस्तर छोड़ दिया