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ग़ज़ल
हमारी ख़ाक-ए-अफ़्सुर्दा सर-ए-कू-ए-बुताँ रख दी
कहाँ की चीज़ थी तू ने कहाँ ऐ आसमाँ रख दी
मुसव्विर करंजवी
ग़ज़ल
ख़ौफ़-ओ-वहशत बर-सर-ए-बाज़ार रख जाता है कौन
यूँ रग-ए-एहसास पर तलवार रख जाता है कौन
अब्दुस्समद ’तपिश’
ग़ज़ल
ख़्वाहिशों से बर-सर-ए-पैकार हो जाना पड़ा
ख़ुद ही दिल की राह में दीवार हो जाना पड़ा