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ग़ज़ल
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हो बरा-ए-शाम-ए-हिज्राँ लब-ए-नाज़ से फ़रोज़ाँ
कोई एक शम्-ए-पैमाँ कोई इक चराग़-ए-व'अदा
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
रू-ब-रू उन के कहाँ थी फ़ुर्सत-ए-इज़हार-ए-ग़म
लब को इक जुम्बिश बराए नाम हो कर रह गई