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ग़ज़ल
हाए वो हुस्न-ओ-इश्क़ जब 'बासित'-ए-बे-क़रार को
बर्क़-ए-निगाह-ए-दोस्त ने फूँक दिया जला दिया
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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हाए वो हुस्न-ओ-इश्क़ जब 'बासित'-ए-बे-क़रार को
बर्क़-ए-निगाह-ए-दोस्त ने फूँक दिया जला दिया